श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 125-126
 
 
श्लोक  12.342.125-126 
यदक्षरमथाव्यक्तमीशं लोकस्य भावनम्॥ १२५॥
कूटस्थं कर्तृ निर्द्वन्द्वमकर्तेति च यं विदु:।
व्यक्तिभावगतस्यास्य एका मूर्तिरियं शुभा॥ १२६॥
 
 
अनुवाद
यह उसी परम पुरुष की मंगलमय प्रतिमा है जो सम्पूर्ण जगत का रचयिता है, अविनाशी और अव्यक्त ईश्वर है, जिसे ज्ञानी पुरुष शाश्वत, कर्ता-अकर्ता से रहित, व्यक्त अवस्था को प्राप्त हुए मानते हैं।
 
This is an auspicious image of the same Supreme Being who is the creator of the entire universe, the indestructible and unmanifest God, whom wise men consider to be eternal, without conflict, the doer and the non-doer, who has attained the expressed state.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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