श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 113
 
 
श्लोक  12.342.113 
तच्च शूलं विनिर्धूतं हुंकारेण महात्मना।
जगाम शंकरकरं नारायणसमाहतम्॥ ११३॥
 
 
अनुवाद
तब महात्मा नारायण ने गर्जना करके उस त्रिशूल को पीछे धकेल दिया। नारायण की गर्जना से चौंककर वह त्रिशूल शंकरजी के हाथ में चला गया।
 
Then Mahatma Narayana pushed back that trident by making a roar. Shocked by Narayana's roar, it went into Shankarji's hands.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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