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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय
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श्लोक 106-107h
श्लोक
12.342.106-107h
पुराहमात्मज: पार्थ प्रथित: कारणान्तरे॥ १०६॥
धर्मस्य कुरुशार्दूल ततोऽहं धर्मज: स्मृत:।
अनुवाद
हे कुरुश्रेष्ठ! कुन्तीपुत्र! पूर्वकाल में किसी कारणवश मैं धर्मपुत्र के रूप में विख्यात हुआ। इसीलिए मुझे 'धर्मज' कहा जाता है। 106 1/2
O best of the Kurus! Son of Kunti! In the past, for some reason, I became famous as the son of Dharma. That is why I am called 'Dharmaja'. 106 1/2
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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