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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 103-104
 
 
श्लोक  12.342.103-104 
बाभ्रव्यगोत्र: स बभौ प्रथमं क्रमपारग:॥ १०३॥
नारायणाद् वरं लब्ध्वा प्राप्य योगमनुत्तमम्।
क्रमं प्रणीय शिक्षां च प्रणयित्वा स गालव:॥ १०४॥
 
 
अनुवाद
बाभ्रव्य गोत्र में उत्पन्न महर्षि गालव ने भगवान नारायण से वरदान और परम योग पाकर सर्वप्रथम वेदों के विविध विभागों और शिक्षाओं का अध्ययन किया और वेदों के सभी विभागों में निपुण विद्वान् हो गए ॥103-104॥
 
Born in Babhravya Gotra, Maharishi Galav, after getting a boon and supreme yoga from Lord Narayana, he first studied the various divisions and teachings of the Vedas and became an expert scholar in all the divisions of the Vedas. 103-104॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)