श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 342: सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन, ब्राह्मणोंकी महिमा बतानेवाली अनेक प्रकारकी संक्षिप्त कथाओंका उल्लेख, भगवन्नामोंके हेतु तथारुद्रके साथ होनेवाले युद्धमें नारायणकी विजय  »  श्लोक 100-101h
 
 
श्लोक  12.342.100-101h 
शाखाभेदाश्च ये केचिद् याश्च शाखासु गीतय:॥ १००॥
स्वरवर्णसमुच्चारा: सर्वांस्तान् विद्धि मत्कृतान्।
 
 
अनुवाद
वेदों की जो-जो भिन्न-भिन्न शाखाएँ हैं, उन शाखाओं में जितने भी गीत हैं तथा उन गीतों में जितने भी स्वर और अक्षर उच्चारण के तरीके हैं, उन सबको तू मेरे द्वारा रचित समझ ॥100 1/2॥
 
Whatever are the different branches of the Vedas, all the songs in those branches and all the ways of pronouncing the vowels and letters in those songs, consider them all to be created by me. ॥100 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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