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mahabharat 12.341.46-47: जब त्रितिमुनियों को उनके भाइयों ने कुएँ में फेंक दिया, तब ऋषियों ने मुझसे इस प्रकार प्रार्थना की - ‘पृश्निगर्भ! एकात और द्वित द्वारा फेंके गए त्रित को डूबने से बचाओ।’ उस समय मेरे नाम पृश्निगर्भ का बार-बार जप करके ब्रह्माजी के प्रथम पुत्र महामुनि त्रित उस कुएँ से बाहर आ गए।   |   mahabharat अध्याय 12.341: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको अपने प्रभावका वर्णन करते हुए अपने नामोंकी व्युत्पत्ति एवं माहात्म्य बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 341: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको अपने प्रभावका वर्णन करते हुए अपने नामोंकी व्युत्पत्ति एवं माहात्म्य बताना  »  श्लोक 46-47
 
 
श्लोक  12.341.46-47 
ऋषय: प्राहुरेवं मां त्रितं कूपनिपातितम्।
पृश्निगर्भ त्रितं पाहीत्येकतद्वितपातितम्॥ ४६॥
तत: स ब्रह्मण: पुत्र आद्यो ह्यृषिवरस्त्रित:।
उत्ततारोदपानाद् वै पृश्निगर्भानुकीर्तनात्॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
जब त्रितिमुनियों को उनके भाइयों ने कुएँ में फेंक दिया, तब ऋषियों ने मुझसे इस प्रकार प्रार्थना की - ‘पृश्निगर्भ! एकात और द्वित द्वारा फेंके गए त्रित को डूबने से बचाओ।’ उस समय मेरे नाम पृश्निगर्भ का बार-बार जप करके ब्रह्माजी के प्रथम पुत्र महामुनि त्रित उस कुएँ से बाहर आ गए।
 
When the Tritimunis were thrown into the well by their brothers, the sages prayed to me thus - 'Prishnigarbha! Please save Trita, who has been thrown by Ekaat and Dvit, from drowning.' At that time, by repeatedly chanting my name Prishnigarbha, the great sage Trita, the first son of Brahmaji, came out of that well.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)