Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.341.33-34: तुमने मुझसे सुना है कि दुःखी, जिज्ञासु, धन के इच्छुक और ज्ञानी मेरे चार प्रकार के भक्त हैं। इनमें से जो केवल मेरी ही पूजा करते हैं और अन्य देवताओं की पूजा नहीं करते, वे श्रेष्ठ हैं। जो भक्त निष्काम भाव से सभी कर्म करते हैं, उनका परम गति मैं ही हूँ। | mahabharat अध्याय 12.341: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको अपने प्रभावका वर्णन करते हुए अपने नामोंकी व्युत्पत्ति एवं माहात्म्य बताना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
चतुर्विधा मम जना भक्ता एव हि मे श्रुतम्॥ ३३॥
तेषामेकान्तिन: श्रेष्ठा ये चैवानन्यदेवता:।
अहमेव गतिस्तेषां निराशी: कर्मकारिणाम्॥ ३४॥
अनुवाद
तुमने मुझसे सुना है कि दुःखी, जिज्ञासु, धन के इच्छुक और ज्ञानी मेरे चार प्रकार के भक्त हैं। इनमें से जो केवल मेरी ही पूजा करते हैं और अन्य देवताओं की पूजा नहीं करते, वे श्रेष्ठ हैं। जो भक्त निष्काम भाव से सभी कर्म करते हैं, उनका परम गति मैं ही हूँ।
You have heard from me that the distressed, the curious, the seeker of wealth and the wise are my four types of devotees. Among these, those who worship me alone and do not worship other gods are the best. I am the ultimate destination of those devotees who perform all their actions without any selfish motive.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥