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mahabharat 12.341.28-29h: हे पाण्डवों को आनन्द देने वाले अर्जुन! मुझे दूसरा कोई वर नहीं दे सकता; ऐसा सोचकर मैंने स्वयं पुत्र प्राप्ति के लिए अपनी आत्मा, पुराण पुरुष जगदीश्वर रुद्र की आराधना की।   |   mahabharat अध्याय 12.341: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको अपने प्रभावका वर्णन करते हुए अपने नामोंकी व्युत्पत्ति एवं माहात्म्य बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 341: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको अपने प्रभावका वर्णन करते हुए अपने नामोंकी व्युत्पत्ति एवं माहात्म्य बताना  »  श्लोक 28-29h
 
 
श्लोक  12.341.28-29h 
न हि मे केनचिद् देयो वर: पाण्डवनन्दन।
इति संचिन्त्य मनसा पुराणं रुद्रमीश्वरम्॥ २८॥
पुत्रार्थमाराधितवानहमात्मानमात्मना।
 
 
अनुवाद
हे पाण्डवों को आनन्द देने वाले अर्जुन! मुझे दूसरा कोई वर नहीं दे सकता; ऐसा सोचकर मैंने स्वयं पुत्र प्राप्ति के लिए अपनी आत्मा, पुराण पुरुष जगदीश्वर रुद्र की आराधना की।
 
O Arjuna, the one who brings joy to the Pandavas! No one else can grant me any other boon; thinking this, I myself worshipped my own soul, the Puran Purusha Jagdishwar Rudra, to obtain a son. 28 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)