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mahabharat 12.341.24-25h: यदि मैं वरदाता भगवान शिव की पूजा न करूँ, तो दूसरा कोई भी उन आत्मस्वरूप शंकर की पूजा नहीं करेगा, ऐसी मेरी मान्यता है ॥24 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.341: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको अपने प्रभावका वर्णन करते हुए अपने नामोंकी व्युत्पत्ति एवं माहात्म्य बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 341: भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको अपने प्रभावका वर्णन करते हुए अपने नामोंकी व्युत्पत्ति एवं माहात्म्य बताना  »  श्लोक 24-25h
 
 
श्लोक  12.341.24-25h 
यद्यहं नार्चयेयं वै ईशानं वरदं शिवम्॥ २४॥
आत्मानं नार्चयेत् कश्चिदिति मे भावितात्मन:।
 
 
अनुवाद
यदि मैं वरदाता भगवान शिव की पूजा न करूँ, तो दूसरा कोई भी उन आत्मस्वरूप शंकर की पूजा नहीं करेगा, ऐसी मेरी मान्यता है ॥24 1/2॥
 
If I do not worship Lord Shiva, the giver of boons, then no one else would worship that soul-form Shankar, this is my belief. ॥24 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)