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mahabharat 12.340.95: श्री भगवान बोले - ब्रह्मन् ! तुम समस्त लोकों के कर्मों और उनसे होने वाली गतियों का व्यवस्थित रूप से विचार करो; क्योंकि तुम ही समस्त प्राणियों के रचयिता हो, तुम ही सबके स्वामी हो और तुम ही इस जगत के गुरु हो ॥95॥   |   mahabharat अध्याय 12.340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  12.340.95 
श्रीभगवानुवाच
लोककार्यगती: सर्वास्त्वं चिन्तय यथाविधि।
धाता त्वं सर्वभूतानां त्वं प्रभुर्जगतो गुरु:॥ ९५॥
 
 
अनुवाद
श्री भगवान बोले - ब्रह्मन् ! तुम समस्त लोकों के कर्मों और उनसे होने वाली गतियों का व्यवस्थित रूप से विचार करो; क्योंकि तुम ही समस्त प्राणियों के रचयिता हो, तुम ही सबके स्वामी हो और तुम ही इस जगत के गुरु हो ॥95॥
 
Shri Bhagwan said – Brahman! You should think systematically about all the actions of all the worlds and the movements resulting from them; Because you are the creator of all living beings, you are the Lord of all and you are the Guru of this world. 95॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)