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mahabharat 12.340.76-77h: मैं क्षेत्रज्ञ हूँ। जो मनुष्य कर्म में तत्पर रहते हैं, वे पुनरावृति के अधीन हैं; इसलिए उनके लिए यह निवृत्ति मार्ग कठिन है। जीव जिस प्रकार उत्पन्न होता है और जिस कर्म या निवृत्ति में प्रवृत्त होता है, उसे उसी का महान फल प्राप्त होता है।' 76 1/2   |   mahabharat अध्याय 12.340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना  »  श्लोक 76-77h
 
 
श्लोक  12.340.76-77h 
सोऽहं क्रियावतां पन्था: पुनरावृत्तिदुर्लभ:।
यो यथा निर्मितो जन्तुर्यस्मिन् यस्मिंश्च कर्मणि॥ ७६॥
प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा तत्फलं सोऽश्नुते महत्।
 
 
अनुवाद
मैं क्षेत्रज्ञ हूँ। जो मनुष्य कर्म में तत्पर रहते हैं, वे पुनरावृति के अधीन हैं; इसलिए उनके लिए यह निवृत्ति मार्ग कठिन है। जीव जिस प्रकार उत्पन्न होता है और जिस कर्म या निवृत्ति में प्रवृत्त होता है, उसे उसी का महान फल प्राप्त होता है।' 76 1/2
 
‘I am that knower of the field. The men who are devoted to action are subject to repetition; therefore this path of retirement is difficult for them. The way in which a being is created and whatever action or retirement he engages in, he gets the great fruits of the same. 76 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)