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mahabharat 12.340.51: हे महान धैर्यवान देवताओं! तुम लोगों ने मेरी आराधना की इच्छा से महान तप किया है। उस तप का उत्तम फल तुम्हें अवश्य मिलेगा। 51॥   |   mahabharat अध्याय 12.340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  12.340.51 
सुतप्तं च तपो देवा ममाराधनकाम्यया।
भोक्ष्यथास्य महासत्त्वास्तपस: फलमुत्तमम्॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
हे महान धैर्यवान देवताओं! तुम लोगों ने मेरी आराधना की इच्छा से महान तप किया है। उस तप का उत्तम फल तुम्हें अवश्य मिलेगा। 51॥
 
Great patient gods! You people have performed great penance with the desire to worship me. You will definitely enjoy the best fruits of that penance. 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)