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mahabharat 12.340.48: एक हजार दिव्य वर्षों तक अत्यन्त कठोर तपस्या करने के पश्चात् उन्होंने वेदों और वेदांगों से सुशोभित एक मधुर वाणी सुनी।   |   mahabharat अध्याय 12.340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  12.340.48 
दिव्यं वर्षसहस्रं ते तपस्तप्त्वा सुदारुणम्।
शुश्रुवुर्मधुरां वाणीं वेदवेदाङ्गभूषिताम्॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
एक हजार दिव्य वर्षों तक अत्यन्त कठोर तपस्या करने के पश्चात् उन्होंने वेदों और वेदांगों से सुशोभित एक मधुर वाणी सुनी।
 
After performing extremely rigorous penance for one thousand divine years, he heard a sweet voice adorned with the Vedas and Vedangas.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)