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mahabharat 12.340.22-23: सिद्धों और चारणों से सेवित, मेरु पर्वत के सुन्दर शिखर पर वेदों का अध्ययन करते समय, किसी समय हम सभी शिष्यों के मन में वही शंका उत्पन्न हुई थी, जो तुमने आज पूछी है। हे भरत! व्यासजी ने हम शिष्यों को जो उत्तर दिया था, वही मैंने भी उनके मुख से सुना था। वही आज मुझे तुमसे कहना है॥ 22-23॥   |   mahabharat अध्याय 12.340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  12.340.22-23 
मेरौ गिरिवरे रम्ये सिद्धचारणसेविते।
तेषामभ्यस्यतां वेदान् कदाचित् संशयोऽभवत्॥ २२॥
एष वै यस्त्वया पृष्टस्तेन तेषां प्रकीर्तित:।
तत: श्रुतो मया चापि तवाख्येयोऽद्य भारत॥ २३॥
 
 
अनुवाद
सिद्धों और चारणों से सेवित, मेरु पर्वत के सुन्दर शिखर पर वेदों का अध्ययन करते समय, किसी समय हम सभी शिष्यों के मन में वही शंका उत्पन्न हुई थी, जो तुमने आज पूछी है। हे भरत! व्यासजी ने हम शिष्यों को जो उत्तर दिया था, वही मैंने भी उनके मुख से सुना था। वही आज मुझे तुमसे कहना है॥ 22-23॥
 
While studying Vedas on the beautiful peak of Mount Meru, served by Siddhas and Charanas, at some point of time, the same doubt arose in the minds of all of us disciples, which you have asked today. O Bharata! I too had heard the answer given by Vyasa to us disciples from his mouth. I have to tell the same to you today.॥ 22-23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)