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mahabharat 12.340.110: वैशम्पायनजी कहते हैं - 'जनमेजय! परम बुद्धिमान वेदव्यासजी ने हम सब शिष्यों को तथा अपने परम धर्मात्मा पुत्र शुकदेवजी को भी यही उपदेश दिया था ॥110॥   |   mahabharat अध्याय 12.340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना  »  श्लोक 110
 
 
श्लोक  12.340.110 
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तास्तु वयं तेन वेदव्यासेन धीमता।
सर्वे शिष्या: सुतश्चास्य शुक: परमधर्मवित्॥ ११०॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - 'जनमेजय! परम बुद्धिमान वेदव्यासजी ने हम सब शिष्यों को तथा अपने परम धर्मात्मा पुत्र शुकदेवजी को भी यही उपदेश दिया था ॥110॥
 
Vaishmpayana says, 'Janamejaya! The most intelligent Vedavyasa gave the same advice to all of us disciples and to his most religious son, Shukadeva. ॥110॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)