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mahabharat 12.340.107: जिनका स्वरूप गुप्त है, जो केवल ज्ञानचक्षु से ही देखे जा सकते हैं और जो अक्षर-अक्षरस्वरूप हैं, उन श्रीहरि को नमस्कार है। ये अविनाशी नारायणदेव सर्वत्र व्याप्त हैं; उनकी सर्वत्र गति है। 107॥   |   mahabharat अध्याय 12.340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना  »  श्लोक 107
 
 
श्लोक  12.340.107 
गुह्याय ज्ञानदृश्याय अक्षराय क्षराय च।
एष देव: संचरति सर्वत्रगतिरव्यय:॥ १०७॥
 
 
अनुवाद
जिनका स्वरूप गुप्त है, जो केवल ज्ञानचक्षु से ही देखे जा सकते हैं और जो अक्षर-अक्षरस्वरूप हैं, उन श्रीहरि को नमस्कार है। ये अविनाशी नारायणदेव सर्वत्र व्याप्त हैं; उनकी सर्वत्र गति है। 107॥
 
Salute those Sri Haris whose form is secret, who can be seen only with the eye of knowledge and who are in the form of letters and letters. This imperishable Narayandev spreads everywhere; They have speed everywhere. 107॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)