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mahabharat 12.340.100: वे ही भगवान नारायण हैं जो प्रजा के आदि, मध्य और अन्त हैं। वे ही सृष्टिकर्ता, उद्देश्य, कर्ता और कार्य हैं। वे ही युग के अंत में सम्पूर्ण लोकों का संहार करके सो जाते हैं। वे ही कल्प के प्रारंभ में जागते हैं और सम्पूर्ण जगत की रचना करते हैं॥100॥   |   mahabharat अध्याय 12.340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  12.340.100 
स आदि: स मध्य: स चान्त: प्रजानां
स धाता स धेयं स कर्ता स कार्यम्।
युगान्ते प्रसुप्त: सुसंक्षिप्य लोकान्
युगादौ प्रबुद्धो जगद्‍ध्युत्ससर्ज॥ १००॥
 
 
अनुवाद
वे ही भगवान नारायण हैं जो प्रजा के आदि, मध्य और अन्त हैं। वे ही सृष्टिकर्ता, उद्देश्य, कर्ता और कार्य हैं। वे ही युग के अंत में सम्पूर्ण लोकों का संहार करके सो जाते हैं। वे ही कल्प के प्रारंभ में जागते हैं और सम्पूर्ण जगत की रचना करते हैं॥100॥
 
He alone is Lord Narayana who is the beginning, middle and end of the people. He alone is the creator, the aim, the doer and the effect. He alone destroys all the worlds at the end of the age and goes to sleep. He alone wakes up at the beginning of the Kalpa and creates the entire world.॥100॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)