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mahabharat 12.340.1: शौनकजी बोले - सूतनंदन! वे प्रभावशाली वेदवेद्य भगवान नारायणदेव ही यज्ञों में प्रथम भाग लेने वाले माने गए हैं और वे ही वेद-वेदांगों के ज्ञाता तथा निरन्तर यज्ञधारी भी कहे गए हैं। एक ही ईश्वर में यज्ञ के कर्ता और भोक्ता दोनों कैसे सम्भव हैं?॥1॥   |   mahabharat अध्याय 12.340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 340: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवान‍्द्वारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके उपदेशका रहस्य बताना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.340.1 
शौनक उवाच
कथं स भगवान् देवो यज्ञेष्वग्रहर: प्रभु:।
यज्ञधारी च सततं वेदवेदाङ्गवित् तथा॥ १॥
 
 
अनुवाद
शौनकजी बोले - सूतनंदन! वे प्रभावशाली वेदवेद्य भगवान नारायणदेव ही यज्ञों में प्रथम भाग लेने वाले माने गए हैं और वे ही वेद-वेदांगों के ज्ञाता तथा निरन्तर यज्ञधारी भी कहे गए हैं। एक ही ईश्वर में यज्ञ के कर्ता और भोक्ता दोनों कैसे सम्भव हैं?॥1॥
 
Shaunakji said – Sutanandan! That influential Vedvedya Lord Narayandev is considered to be the one who takes the first part in the Yagyas and he is also said to be the God who knows the Vedas and the Vedangas and is a constant Yagyadhari (Yagya performer). How are both the doers and enjoyers of yagyas possible in the same God? 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)