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mahabharat 12.34.26: यदि स्वप्न में किसी कारणवश वीर्य स्खलित हो जाए, तो ब्रह्मचारी को पुनः व्रत लेने या उपनयन संस्कार करने की आवश्यकता नहीं होती। इसके लिए प्रज्वलित अग्नि में घी की आहुति देना प्रायश्चित कहा गया है॥ 26॥   |   mahabharat अध्याय 12.34: जिन कर्मोंके करने और न करनेसे कर्ता प्रायश्चित्तका भागी होता और नहीं होता—उनका विवेचन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 34: जिन कर्मोंके करने और न करनेसे कर्ता प्रायश्चित्तका भागी होता और नहीं होता—उनका विवेचन  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  12.34.26 
नावर्तते व्रतं स्वप्ने शुक्रमोक्षे कथंचन।
आज्यहोम: समिद्धेऽग्नौ प्रायश्चित्तं विधीयते॥ २६॥
 
 
अनुवाद
यदि स्वप्न में किसी कारणवश वीर्य स्खलित हो जाए, तो ब्रह्मचारी को पुनः व्रत लेने या उपनयन संस्कार करने की आवश्यकता नहीं होती। इसके लिए प्रज्वलित अग्नि में घी की आहुति देना प्रायश्चित कहा गया है॥ 26॥
 
If due to any reason semen is ejaculated in a dream, then it is not necessary for the brahmacari to take a vow again or to perform the Upanayan ceremony. For this, offering ghee in a blazing fire is said to be the atonement.॥ 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)