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mahabharat 12.34.23-24: (चोरी पूर्णतः निषिद्ध है) किन्तु जो व्यक्ति संकट के समय अपने गुरु के लिए चोरी करता है, उसे कोई पाप नहीं लगता। यदि वह मन में इच्छा रखकर बार-बार चोरी का कार्य नहीं करता, तो जो व्यक्ति संकट के समय ब्राह्मण के अतिरिक्त किसी अन्य से धन लेता है, उसे भी पाप नहीं लगता। जो व्यक्ति स्वयं चोरी का अन्न नहीं खाता, उसे भी चोरी का पाप नहीं लगता।   |   mahabharat अध्याय 12.34: जिन कर्मोंके करने और न करनेसे कर्ता प्रायश्चित्तका भागी होता और नहीं होता—उनका विवेचन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 34: जिन कर्मोंके करने और न करनेसे कर्ता प्रायश्चित्तका भागी होता और नहीं होता—उनका विवेचन  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  12.34.23-24 
स्तेयं कुर्वंश्च गुर्वर्थमापत्सु न निषिध्यते।
बहुश: कामकारेण न चेद् य: सम्प्रवर्तते॥ २३॥
अन्यत्र ब्राह्मणस्वेभ्य आददानो न दुष्यति।
स्वयमप्राशिता यश्च न स पापेन लिप्यते॥ २४॥
 
 
अनुवाद
(चोरी पूर्णतः निषिद्ध है) किन्तु जो व्यक्ति संकट के समय अपने गुरु के लिए चोरी करता है, उसे कोई पाप नहीं लगता। यदि वह मन में इच्छा रखकर बार-बार चोरी का कार्य नहीं करता, तो जो व्यक्ति संकट के समय ब्राह्मण के अतिरिक्त किसी अन्य से धन लेता है, उसे भी पाप नहीं लगता। जो व्यक्ति स्वयं चोरी का अन्न नहीं खाता, उसे भी चोरी का पाप नहीं लगता।
 
(Theft is completely prohibited) But a person who steals for his Guru in times of crisis is not guilty of any sin. If he does not indulge in that act of theft repeatedly with a desire in his mind, then a person who takes money from anyone other than a Brahmin in times of crisis is not guilty of sin. One who does not eat the stolen food himself is also not involved in the sin of theft.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)