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mahabharat 12.34.2: व्यासजी बोले- राजन! जो मनुष्य शास्त्रविधि का पालन न करके निषिद्ध कर्म करता है, वह उस विपरीत आचरण के कारण प्रायश्चित को प्राप्त होता है॥2॥   |   mahabharat अध्याय 12.34: जिन कर्मोंके करने और न करनेसे कर्ता प्रायश्चित्तका भागी होता और नहीं होता—उनका विवेचन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 34: जिन कर्मोंके करने और न करनेसे कर्ता प्रायश्चित्तका भागी होता और नहीं होता—उनका विवेचन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.34.2 
व्यास उवाच
अकुर्वन् विहितं कर्म प्रतिषिद्धानि चाचरन्।
प्रायश्चित्तीयते ह्येवं नरो मिथ्यानुवर्तयन्॥ २॥
 
 
अनुवाद
व्यासजी बोले- राजन! जो मनुष्य शास्त्रविधि का पालन न करके निषिद्ध कर्म करता है, वह उस विपरीत आचरण के कारण प्रायश्चित को प्राप्त होता है॥2॥
 
Vyasji said- Rajan! A person who instead of following the scriptures and commits a prohibited act, is liable to undergo penance because of that contrary conduct. 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)