अध्याय 34: जिन कर्मोंके करने और न करनेसे कर्ता प्रायश्चित्तका भागी होता और नहीं होता—उनका विवेचन
श्लोक 1: युधिष्ठिर ने पूछा, "पितामह! कौन-से कर्म करने से मनुष्य प्रायश्चित का पात्र बनता है और कौन-सा प्रायश्चित करने से वह पापों से मुक्त हो जाता है? कृपया मुझे इस विषय में बताइए।"
श्लोक 2: व्यासजी बोले- राजन! जो मनुष्य शास्त्रविधि का पालन न करके निषिद्ध कर्म करता है, वह उस विपरीत आचरण के कारण प्रायश्चित को प्राप्त होता है॥2॥
श्लोक 3: जो ब्रह्मचारी सूर्योदय या सूर्यास्त तक सोता है तथा जिसके नाखून और दांत काले हैं, उसे तप करना चाहिए ॥3॥
श्लोक 4-8: कुंती नंदन! इसके अतिरिक्त परिवेत्ता (बड़ा भाई अविवाहित रहते हुए विवाह कर ले), परिवेत्ता (परिवेत्ता का बड़ा भाई), ब्रह्महत्यारा (ब्राह्मण का हत्यारा), दूसरों की निन्दा करने वाला, छोटी बहन के विवाह के पश्चात् उसकी बड़ी बहन से विवाह करने वाला, बड़ी बहन के अविवाहित रहते हुए उसकी छोटी बहन से विवाह करने वाला, व्रतभंग करने वाला ब्रह्मचारी, ब्राह्मण की हत्या करने वाला, अयोग्य व्यक्ति को दान देने वाला, योग्य ब्राह्मण को दान न देने वाला, गाँव को नष्ट करने वाला, मांस बेचने वाला, आग लगाने वाला, वेतन लेकर वेद पढ़ाने वाला तथा स्त्री या शूद्र की हत्या करने वाला, इनमें से पहले वाले बाद वालों से अधिक पापी हैं तथा पशुवध करने वाला, दूसरों के घर में आग लगाने वाला, झूठ बोलकर जीविका चलाने वाला, गुरु का अपमान करने वाला तथा सदाचार की मर्यादा का उल्लंघन करने वाला - ये सभी पापी माने गए हैं। उन्हें तप करना चाहिए॥4-8॥
श्लोक 9: इनके अतिरिक्त मैं तुम्हें उन कर्मों के विषय में भी बताऊँगा जो संसार और वेद के नियमों के विरुद्ध नहीं करने चाहिए। मेरी बात एकाग्रचित्त होकर सुनो और समझो॥9॥
श्लोक 10-13: भारतवर्ष में अपने धर्म का त्याग करके दूसरे का धर्म अपनाना, यज्ञ कराने के अधिकार से रहित व्यक्ति से यज्ञ करवाना और अभक्ष्य पदार्थों का भक्षण करना, शरणागतों का त्याग करके उनका भरण-पोषण करने में समर्थ व्यक्तियों का भरण-पोषण न करना, तथा रस बेचना, पशु-पक्षियों को मारना और बल होते हुए भी हवन आदि कर्म न करना, नित्य दिया जाने वाला गोग्रास आदि न देना, ब्राह्मणों को दक्षिणा न देना और उनका सब कुछ छीन लेना, ये सब धर्मतत्त्व के कर्म हैं। जानने वालों ने कहा है कि ये सब कर्म नहीं करने चाहिए।
श्लोक 14: राजा! जो पुरुष अपने पिता से झगड़ता है, गुरु की शय्या पर सोता है और रजस्वला होने पर भी अपनी स्त्री से समागम नहीं करता, वह अधार्मिक है ॥14॥
श्लोक 15: ये कर्म जो विस्तारपूर्वक और संक्षेप में बताए गए हैं, उनमें से कुछ को करने और कुछ को न करने से मनुष्य प्रायश्चित का भागी बनता है ॥15॥
श्लोक 16: अब उन कारणों का वर्णन सुनो जिनके कारण मनुष्य इन कर्मों को करते हुए भी पाप में लिप्त नहीं होता ॥16॥
श्लोक 17: यदि कोई वेद-वेदान्त का विद्वान् ब्राह्मण हाथ में शस्त्र लेकर युद्धभूमि में मारने के लिए आए, तो उसे स्वयं उसे मारने का प्रयत्न करना चाहिए। इससे ब्रह्महत्या का पाप नहीं लगता। 17॥
श्लोक 18: कुन्ती नन्दन! इस विषय में वेदों का एक मन्त्र भी कहा गया है। मैं आपसे उसी धर्म की बात कह रहा हूँ जो वैदिक प्रमाणों से प्रतिपादित है। ॥18॥
श्लोक 19: जो ब्राह्मण का आचरण भ्रष्ट करके अत्याचारी हो गया है और हाथ में शस्त्र लेकर मारने आया है, उसे ब्राह्मण-हत्या का पाप नहीं लगता। उसके क्रोध का निवारण केवल क्रोध ही कर सकता है॥19॥
श्लोक 20: यदि कोई अनजाने में अथवा संकट में होने पर भी मदिरा का सेवन कर ले, तो बाद में धार्मिक व्यक्तियों की आज्ञा के अनुसार उसका पुनः संस्कार कर लेना चाहिए ॥20॥
श्लोक 21: कुन्तीनन्दन! यही बात अन्य सभी अभक्ष्य पदार्थों के विषय में भी कही गई है। पश्चाताप करने से सब कुछ शुद्ध हो जाता है। 21॥
श्लोक 22: अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए गुरु की आज्ञा लेकर गुरु की शय्या पर सोने से मनुष्य अपवित्र नहीं होता। उद्दालक ने अपने शिष्य के द्वारा ही अपने पुत्र श्वेतकेतु को जन्म दिया था ॥22॥
श्लोक 23-24: (चोरी पूर्णतः निषिद्ध है) किन्तु जो व्यक्ति संकट के समय अपने गुरु के लिए चोरी करता है, उसे कोई पाप नहीं लगता। यदि वह मन में इच्छा रखकर बार-बार चोरी का कार्य नहीं करता, तो जो व्यक्ति संकट के समय ब्राह्मण के अतिरिक्त किसी अन्य से धन लेता है, उसे भी पाप नहीं लगता। जो व्यक्ति स्वयं चोरी का अन्न नहीं खाता, उसे भी चोरी का पाप नहीं लगता।
श्लोक 25: यदि कोई अपनी या किसी दूसरे की जान बचाने के लिए, गुरु के निमित्त, अकेले में अपनी पत्नी से विनोद करते समय या विवाह के प्रसंग में झूठ बोले, तो उसे कोई पाप नहीं लगता।
श्लोक 26: यदि स्वप्न में किसी कारणवश वीर्य स्खलित हो जाए, तो ब्रह्मचारी को पुनः व्रत लेने या उपनयन संस्कार करने की आवश्यकता नहीं होती। इसके लिए प्रज्वलित अग्नि में घी की आहुति देना प्रायश्चित कहा गया है॥ 26॥
श्लोक 27: यदि बड़ा भाई पापी हो जाए या संन्यास ले ले, तो छोटे भाई का अविवाहित रहने पर भी विवाह करना दोष नहीं है। यदि कोई स्त्री संतान प्राप्ति के लिए प्रार्थना करती है और किसी अन्य स्त्री के साथ संभोग करती है, तो इससे धर्म का लोप नहीं होता।
श्लोक 28: मनुष्य को चाहिए कि वह पशुओं को न तो अनावश्यक मारे और न मरवाए। पशुओं के लिए विधिपूर्वक किया गया कर्मकाण्ड उन पर उपकार है॥28॥
श्लोक 29: यदि अनजाने में ही अयोग्य ब्राह्मण को दान दे दिया जाए, अथवा योग्य ब्राह्मण को आदरपूर्वक दान न दिया जाए, तो वह दोष नहीं है ॥29॥
श्लोक 30: यदि व्यभिचारिणी स्त्री का तिरस्कार किया जाए तो वह दोष की बात नहीं है। उस निन्दा से स्त्री पवित्र हो जाती है और पति को भी दोष नहीं लगता। 30॥
श्लोक 31: यदि सोम रस का सार जानकर उसे बेचा जाए, तो विक्रेता को कोई दोष नहीं लगता। काम करने में असमर्थ नौकर को त्यागने में कोई दोष नहीं है। गायों की सुविधा के लिए जंगल में आग लगाने में कोई पाप नहीं है।
श्लोक 32: हे भरतनन्दन! मैंने ये सब कर्म बता दिए, इन्हें करने वाला मनुष्य किसी पाप का भागी नहीं होता। अब मैं प्रायश्चित का विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा॥32॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥