श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  12.339.50 
हिरण्यगर्भो लोकादिश्चतुर्वक्त्रोऽनिरुक्तग:।
ब्रह्मा सनातनो देवो मम बह्वर्थचिन्तक:॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
जो ब्रह्मा सम्पूर्ण जगत के मूल हैं, चतुर्मुख हैं, अनिर्वचनीय हैं, हिरण्यगर्भ हैं और सनातन देवता हैं, वे ही मेरे अनेक कार्यों का चिंतन करते हैं॥ 50॥
 
'Brahma, who is the origin of the entire universe, four-faced, indescribable, Hiranyagarbha and the eternal deity, is the one who contemplates my many activities.॥ 50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)