श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 339: श्वेतद्वीपमें नारदजीको भगवान् का दर्शन, भगवान् का वासुदेव-संकर्षण आदि अपने व्यूह स्वरूपोंका परिचय कराना और भविष्यमें होनेवाले अवतारोंके कार्योंकी सूचना देना और इस कथाके श्रवण-पठनका माहात्म्य  »  श्लोक 37-38h
 
 
श्लोक  12.339.37-38h 
तस्मात् सनत्कुमारत्वं योऽलभत् स्वेन कर्मणा।
यस्मिंश्च सर्वभूतानि प्रलयं यान्ति संक्षयम्॥ ३७॥
स मन: सर्वभूतानां प्रद्युम्न: परिपठॺते।
 
 
अनुवाद
जो उसी आकर्षण या प्राण से उत्पन्न होता है और अपने कर्मों (ध्यान, पूजन आदि) के द्वारा सनत्कुमारत्व (जीवनमुक्ति) को प्राप्त होता है, जिसमें समस्त जीव लय और क्षय को प्राप्त होते हैं, वह समस्त प्राणियों का मन 'प्रद्युम्न' कहलाता है ॥37 1/2॥
 
'The one who is born from the same attraction or life and through his actions (meditation, worship etc.) attains Sanatkumaratva (liberation in life), in which all the living beings attain rhythm and decay, he is called 'Pradyumna', the mind of all the beings. 37 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)