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mahabharat 12.338.4: 1-देवदेवेश! आपको नमस्कार है। 2-आप निष्क्रिय हैं, 3-निर्गुण हैं और 4-आप सम्पूर्ण जगत के साक्षी हैं। 5-क्षेत्रज्ञ, 6-पुरुषोत्तम (क्षर-अक्षर पुरुष से श्रेष्ठ), 7-अनंत, 8-पुरुष, 9-महापुरुष, 10-पुरुषोत्तम (भगवान), 11-त्रिगुण, 12-प्रधान, 13-अमृत, 14-अमृतख्य, 15-अनंतख्य (शेषनागरूप), 16-व्योम (महाकाशरूप), 17-सनातन, 18-सदसद्वयक्तव्यक्त, 19-ऋतधामा (सत्यधाम का स्वरूप), 20-आदिदेव, 21-वसुप्रद (कर्मफल दाता), 22-प्रजापते (कुशल आदि), 23-सुप्रजापते (प्रजापितों में सर्वश्रेष्ठ), 24-वनस्पते, 25-महाप्रजापते (ब्रह्मा का स्वरूप), 26-उर्जास्पेट. (महाशक्तिशाली), 27-वाचस्पते (बृहस्पति), 28-जगत्पते, 29-मनस्पते, 30-दिवास्पते (सूर्य), 31-मरुत्पते (वायुदेवता के स्वामी), 32-सलिपते (जल के स्वामी), 33-पृथ्वीपते, 34-दिक्पते, 35-पूर्वनिवास (उस समय विश्व का आधार रूप) महाप्रलय के), 36-गुह्य (स्वरूप), 37-ब्रह्मपुरोहित, 38-ब्रह्मकायिक, 39-महाराजिक, 40-चतुर्महाराजिक, 41-भसुर (प्रकाशमय), 42-महाभासुर (महान प्रकाश), 43-सप्तमहाभाग, 44-यम्य, 45-महामय, 46-संज्ञासंज्ञा, 47-तुषित, 48-महतुषित, 49-प्रमर्दन (मृत्यु रूप), 50-निर्मित, 51-अविवर्ति, 52-वश्ववर्ती, 53-अपरिनिंदित (शदम आदि गुणों से युक्त), 54-अनंत (अनंत), 55-वश्ववर्ती, 56-अवश्वर्ती, 57-यज्ञ, 58-महायज्ञ, 59-यज्ञसम्भव, 60-यज्ञयोनि (वेदस्वरूप), 61-यज्ञगर्भ, 62-यज्ञहृदय, 63-यज्ञस्तुत, 64-यज्ञभाग, 65-पंचयज्ञ, 66-पंचकालकर्तृपति (अहोरात्रि, मास, ऋतु, अयन और के स्वामी) समय का संवत्सर रूप), 67-पंचरात्रिक, 68-वैकुंठ (परमधाम), 69-अपराजित, 70-मानसिक, 71-नानामिक (जिसमें सभी नाम शामिल हैं), 72-परस्वामी (भगवान), 73-सुस्नत, 74-हंस, 75-परमहंस, 76-महामहंस, 77-परमयाज्ञिक, 78-सांख्ययोगरूप, 79-सांख्यमूर्ति (ज्ञानमूर्ति), 80-अमृतेशाय (विष्णु), 81-हिरण्येशाय, 82-देवेशाय, 83-कुशेषाय, 84-ब्रह्मेशाय, 85-पद्मेशाय (विष्णु), 86-विश्वेश्वर और 87-विश्वक्सेन आदि आपके नाम हैं। 88- आप जगदान्वय (संसार में व्याप्त) हैं और 89- आप संसार के कारण हैं। 90- अग्नि आपका मुख है। 91- आप बड़वानल स्वरूप हैं, 92- आप यज्ञ स्वरूप हैं, 93- सारथी हैं, 94- वषट्कार हैं, 95- ओंकार हैं, 96- तप स्वरूप हैं, 97- मन स्वरूप हैं, 98- चन्द्रमा स्वरूप हैं, 99- आप नेत्रों के देवता सूर्य हैं। 100- सूर्य, 101- दिग्ग्ज, 102- दिग्भानु (दिशाओं के प्रकाशक), 103- विदिगभानु (विभिन्न दिशाओं के प्रकाशक) और 104- हयग्रीवरूप हैं। 105- आप त्रिसौपर्ण मंत्र का जप करने वाले प्रथम पुरुष हैं, 106- ब्राह्मण वर्ण के धारक हैं और 107- पंचाग्नि के स्वरूप हैं। 108- आप नचिकेत नाम से प्रसिद्ध त्रिगुण अग्नि भी हैं। 109- आप शिक्षा, कल्प, व्याकरण, छंद, निरुक्त और ज्योतिष नामक छह अंगों के भंडार हैं। 110-आप प्राग्ज्योतिष स्वरूप हैं, 111-आप ज्येष्ठ द्रव्य स्वरूप हैं। 112-सामिक व्रतधारी, 113-अथर्वशिरा, 114-पंचमहाकालरूप (आप सौर, शाक्त, गाणपत्य, शैव एवं वैष्णव ग्रंथों के उपासक हैं)। 115-फेनपाचार्य, 116-वलाखिल्य मुनिरूप, 117-आप वैखानस मुनिरूप हैं। 118-अभग्नयोग (अखंड योग), 119-अभग्नपरिसंख्यान (अखंड विचार), 120-युगादि (युग का आदि रूप), 121-युगमध्य (युग का मध्य रूप), 122-युगांत (आप युग के स्वरूप हैं), 123-आखंडाल (इंद्र), 124-आप प्राचीन गर्भ हैं, 125-कौशिक मुनि, 126-पुरुषोत्तम (सभी द्वारा अत्यधिक प्रशंसा के योग्य), 137-व्रतवास (उपवास का आश्रय), 138-समुद्रवास (दूध का आश्रय), 139-यशोवास, (कामना का निवास), 140-तपोवास (तपस्या का निवास), 141-दमवास (संयम का आधार), 142-लक्ष्मीनिवास, 143-ज्ञान का आधार, 144-आधार 145- धन का आश्रय, 146- सर्ववास (सबका निवास), 147- वासुदेव, 153- सुखप्रद (सबको सुख प्रदान करने वाले), 154- धनप्रद (सबको धन देने वाले), 155- हरिमेध (आप भगवान के भक्त हैं), 156- यम, 157- नियम, 158- महानियम आदि साधन भी आप ही हैं। 159- कृच्छ्र, 160- अतिकृच्छ्र, 161- महाकृच्छ्र, 162- सर्वकृच्छ्र आदि चान्द्रायणव्रत भी आप ही हैं। , 173- महाविभूति (जो सृष्टि के रूप में शक्तिशाली हैं), 174- महात्म्यशरीर (जिनका रूप अतुलनीय है), 175- पवित्र, 176- महापवित्र (जो पवित्र लोगों को भी पवित्र कर देते हैं), 177- हिरण्यमय, 178- बृहद् (ब्रह्म), 179- अप्रतर्क्य (तर्क से न जाने योग्य), 180- अजेय, 181- ब्रह्मग्रह, 182- प्रजा के रचयिता, 183- प्रजा का संहार करने वाले, 184- महामायाधर, 185- चित्रशिखंडी, 186- वरप्रदा, 187- पुरोडाश भाग को ग्रहण करने वाले, 188- गताध्वर (प्राप्ति यज्ञ), 189- छिन्नतृष्ण (तृष्णा रहित), 190-छिन्नसंशय (संशय रहित), 191-सर्वतोवृत्त (सर्वव्यापी), 192-निवृत्तिरूप, 193-ब्राह्मणरूप, 194-ब्रह्मप्रिय, 195-विश्वमूर्ति, 196-महामूर्ति, 197-बान्धव (जगत के मित्र), 198-भक्तवत्सल और 199-ब्रह्मण्यदेव आदि नामों से पुकारे जाने वाले भगवान् आपको नमस्कार है। मैं आपका भक्त हूँ। आपके दर्शन की इच्छा से मैं यहाँ आया हूँ। 200-एकान्त में दर्शन देने वाले भगवान् को बारंबार नमस्कार है।4॥   |   mahabharat अध्याय 12.338: नारदजीका दो सौ नामोंद्वारा भगवान् की स्तुति करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 338: नारदजीका दो सौ नामोंद्वारा भगवान् की स्तुति करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.338.4 
नारद उवाच
१ नमस्ते देवदेवेश २ निष्क्रिय ३ निर्गुण ४ लोकसाक्षिन् ५ क्षेत्रज्ञ ६ पुरुषोत्तम ७ अनन्त ८ पुरुष ९ महापुरुष १० पुरुषोत्तम ११ त्रिगुण १२ प्रधान १३ अमृत १४ अमृताख्य १५ अनन्ताख्य १६ व्योम १७ सनातन १८ सदसद्‍व्यक्ताव्यक्त १९ ऋतधामन् २० आदिदेव २१ वसुप्रद २२ प्रजापते २३ सुप्रजापते २४ वनस्पते २५ महाप्रजापते २६ ऊर्जस्पते २७ वाचस्पते २८ जगत‍्पते २९ मनस्पते ३० दिवस्पते ३१ मरुत्पते ३२ सलिलपते ३३ पृथिवीपते ३४ दिक्पते ३५पूर्वनिवास ३६ गुह्य ३७ ब्रह्मपुरोहित ३८ ब्रह्मकायिक ३९ महाराजिक ४०चातुर्महाराजिक ४१ भासुर ४२ महाभासुर ४३ सप्त-महाभाग ४४ याम्य ४५ महायाम्य ४६ संज्ञासंज्ञ ४७ तुषित ४८ महातुषित ४९ प्रमर्दन ५० परिनिर्मित ५१ अपरिनिर्मित ५२ वशवर्तिन्, ५३ अपरिनिन्दित ५४ अपरिमित ५५ वशवर्तिन् ५६ अवशवर्तिन् ५७ यज्ञ ५८ महायज्ञ ५९ यज्ञसम्भव ६० यज्ञयोने ६१ यज्ञगर्भ ६२ यज्ञहृदय ६३ यज्ञस्तुत ६४ यज्ञभागहर ६५ पञ्चयज्ञ ६६ पञ्चकालकर्तृपते ६७ पाञ्चरात्रिक ६८ वैकुण्ठ ६९ अपराजित ७० मानसिक ७१ नामनामिक ७२ परस्वामिन् ७३सुस्नात ७४ हंस ७५ परमहंस ७६ महाहंस ७७ परमयाज्ञिक ७८ सांख्ययोग ७९ सांख्यमूर्ते ८० अमृतेशय ८१ हिरण्येशय ८२ देवेशय ८३ कुशेशय ८४ ब्रह्मेशय ८५ पद्मेशय ८६ विश्वेश्वर ८७ विष्वक्सेन ८८ त्वं जगदन्वय: ८९ त्वं जगत‍्प्रकृति: ९० तवाग्निरास्यम् ९१ वडवामुखोऽग्नि: ९२ त्वमाहुति: ९३ सारथि: ९४ त्वं वषट्कार: ९५ त्वमोङ्कार: ९६ त्वं तप: ९७ त्वं मन: ९८ त्वं चन्द्रमा: ९९ त्वं चक्षुरादित्यं १०० त्वं सूर्य: १०१ त्वं दिशां गज: १०२ त्वं दिग्भानो १०३ विदिग्भानो १०४ हयशिर: १०५ प्रथमत्रिसौपर्ण: १०६ वर्णधर: १०७ पञ्चाग्ने १०८ त्रिणाचिकेत १०९ षडङ्गनिधान ११० प्राग्ज्योतिष १११ ज्येष्ठसामग ११२ सामिकव्रतधर ११३ अथर्वशिरा: ११४ पञ्चमहाकल्प ११५फेनपाचार्य ११६ वालखिल्य ११७ वैखानस ११८ अभग्नयोग ११९ अभग्नपरिसंख्यान १२० युगादे १२१ युगमध्य १२२ युगनिधन १२३ आखण्डल १२४ प्राचीनगर्भ १२५ कौशिक १२६ पुरुष्टुत १२७ पुरुहूत १२८ विश्वकृत् १२९ विश्वरूप १३० अनन्तगते १३१ अनन्तभोग १३२ अनन्त १३३ अनादे १३४ अमध्य १३५ अव्यक्तमध्य १३६ अव्यक्तनिधन १३७ व्रतावास १३८ समुद्राधिवास १३९ यशोवास १४० तपोवास १४१ दमावास १४२ लक्ष्म्यावास १४३ विद्यावास १४४ कीर्त्यावास १४५ श्रीवास १४६ सर्वावास १४७ वासुदेव १४८ सर्वच्छन्दक १४९ हरिहय १५० हरिमेध १५१ महायज्ञभागहर १५२ वरप्रद १५३ सुखप्रद १५४ धनप्रद १५५ हरिमेध १५६ यम १५७ नियम १५८ महानियम १५९ कृच्छ्र १६० अतिकृच्छ्र १६१ महाकृच्छ्र १६२ सर्वकृच्छ्र १६३ नियमधर १६४ निवृत्तभ्रम १६५ प्रवचनगत १६६ पृश्निगर्भप्रवृत्त १६७ प्रवृत्तवेदक्रिय १६८ अज १६९ सर्वगते १७० सर्वदर्शिन् १७१ अग्राह्य १७२ अचल १७३ महाविभूते १७४ माहात्म्यशरीर १७५ पवित्र १७६ महापवित्र १७७ हिरण्यमय १७८ बृहत् १७९ अप्रतर्क्य १८० अविज्ञेय १८१ ब्रह्माग्रॺ १८२ प्रजासर्गकर १८३ प्रजानिधनकर १८४ महामायाधर १८५ चित्रशिखण्डिन् १८६ वरप्रद १८७ पुरोडाशभागहर १८८ गताध्वर १८९ छिन्नतृष्ण १९० छिन्नसंशय १९१ सर्वतोवृत्त १९२ निवृत्तिरूप १९३ ब्राह्मणरूप १९४ ब्राह्मणप्रिय १९५ विश्वमूर्ते १९६ महामूर्ते १९७ बान्धव १९८ भक्तवत्सल १९९ ब्रह्मण्यदेव भक्तोऽहं त्वां दिदृक्षुरेकान्तदर्शनाय २०० नमो नम:॥४॥
 
 
अनुवाद
1-देवदेवेश! आपको नमस्कार है। 2-आप निष्क्रिय हैं, 3-निर्गुण हैं और 4-आप सम्पूर्ण जगत के साक्षी हैं। 5-क्षेत्रज्ञ, 6-पुरुषोत्तम (क्षर-अक्षर पुरुष से श्रेष्ठ), 7-अनंत, 8-पुरुष, 9-महापुरुष, 10-पुरुषोत्तम (भगवान), 11-त्रिगुण, 12-प्रधान, 13-अमृत, 14-अमृतख्य, 15-अनंतख्य (शेषनागरूप), 16-व्योम (महाकाशरूप), 17-सनातन, 18-सदसद्वयक्तव्यक्त, 19-ऋतधामा (सत्यधाम का स्वरूप), 20-आदिदेव, 21-वसुप्रद (कर्मफल दाता), 22-प्रजापते (कुशल आदि), 23-सुप्रजापते (प्रजापितों में सर्वश्रेष्ठ), 24-वनस्पते, 25-महाप्रजापते (ब्रह्मा का स्वरूप), 26-उर्जास्पेट. (महाशक्तिशाली), 27-वाचस्पते (बृहस्पति), 28-जगत्पते, 29-मनस्पते, 30-दिवास्पते (सूर्य), 31-मरुत्पते (वायुदेवता के स्वामी), 32-सलिपते (जल के स्वामी), 33-पृथ्वीपते, 34-दिक्पते, 35-पूर्वनिवास (उस समय विश्व का आधार रूप) महाप्रलय के), 36-गुह्य (स्वरूप), 37-ब्रह्मपुरोहित, 38-ब्रह्मकायिक, 39-महाराजिक, 40-चतुर्महाराजिक, 41-भसुर (प्रकाशमय), 42-महाभासुर (महान प्रकाश), 43-सप्तमहाभाग, 44-यम्य, 45-महामय, 46-संज्ञासंज्ञा, 47-तुषित, 48-महतुषित, 49-प्रमर्दन (मृत्यु रूप), 50-निर्मित, 51-अविवर्ति, 52-वश्ववर्ती, 53-अपरिनिंदित (शदम आदि गुणों से युक्त), 54-अनंत (अनंत), 55-वश्ववर्ती, 56-अवश्वर्ती, 57-यज्ञ, 58-महायज्ञ, 59-यज्ञसम्भव, 60-यज्ञयोनि (वेदस्वरूप), 61-यज्ञगर्भ, 62-यज्ञहृदय, 63-यज्ञस्तुत, 64-यज्ञभाग, 65-पंचयज्ञ, 66-पंचकालकर्तृपति (अहोरात्रि, मास, ऋतु, अयन और के स्वामी) समय का संवत्सर रूप), 67-पंचरात्रिक, 68-वैकुंठ (परमधाम), 69-अपराजित, 70-मानसिक, 71-नानामिक (जिसमें सभी नाम शामिल हैं), 72-परस्वामी (भगवान), 73-सुस्नत, 74-हंस, 75-परमहंस, 76-महामहंस, 77-परमयाज्ञिक, 78-सांख्ययोगरूप, 79-सांख्यमूर्ति (ज्ञानमूर्ति), 80-अमृतेशाय (विष्णु), 81-हिरण्येशाय, 82-देवेशाय, 83-कुशेषाय, 84-ब्रह्मेशाय, 85-पद्मेशाय (विष्णु), 86-विश्वेश्वर और 87-विश्वक्सेन आदि आपके नाम हैं। 88- आप जगदान्वय (संसार में व्याप्त) हैं और 89- आप संसार के कारण हैं। 90- अग्नि आपका मुख है। 91- आप बड़वानल स्वरूप हैं, 92- आप यज्ञ स्वरूप हैं, 93- सारथी हैं, 94- वषट्कार हैं, 95- ओंकार हैं, 96- तप स्वरूप हैं, 97- मन स्वरूप हैं, 98- चन्द्रमा स्वरूप हैं, 99- आप नेत्रों के देवता सूर्य हैं। 100- सूर्य, 101- दिग्ग्ज, 102- दिग्भानु (दिशाओं के प्रकाशक), 103- विदिगभानु (विभिन्न दिशाओं के प्रकाशक) और 104- हयग्रीवरूप हैं। 105- आप त्रिसौपर्ण मंत्र का जप करने वाले प्रथम पुरुष हैं, 106- ब्राह्मण वर्ण के धारक हैं और 107- पंचाग्नि के स्वरूप हैं। 108- आप नचिकेत नाम से प्रसिद्ध त्रिगुण अग्नि भी हैं। 109- आप शिक्षा, कल्प, व्याकरण, छंद, निरुक्त और ज्योतिष नामक छह अंगों के भंडार हैं। 110-आप प्राग्ज्योतिष स्वरूप हैं, 111-आप ज्येष्ठ द्रव्य स्वरूप हैं। 112-सामिक व्रतधारी, 113-अथर्वशिरा, 114-पंचमहाकालरूप (आप सौर, शाक्त, गाणपत्य, शैव एवं वैष्णव ग्रंथों के उपासक हैं)। 115-फेनपाचार्य, 116-वलाखिल्य मुनिरूप, 117-आप वैखानस मुनिरूप हैं। 118-अभग्नयोग (अखंड योग), 119-अभग्नपरिसंख्यान (अखंड विचार), 120-युगादि (युग का आदि रूप), 121-युगमध्य (युग का मध्य रूप), 122-युगांत (आप युग के स्वरूप हैं), 123-आखंडाल (इंद्र), 124-आप प्राचीन गर्भ हैं, 125-कौशिक मुनि, 126-पुरुषोत्तम (सभी द्वारा अत्यधिक प्रशंसा के योग्य), 137-व्रतवास (उपवास का आश्रय), 138-समुद्रवास (दूध का आश्रय), 139-यशोवास, (कामना का निवास), 140-तपोवास (तपस्या का निवास), 141-दमवास (संयम का आधार), 142-लक्ष्मीनिवास, 143-ज्ञान का आधार, 144-आधार 145- धन का आश्रय, 146- सर्ववास (सबका निवास), 147- वासुदेव, 153- सुखप्रद (सबको सुख प्रदान करने वाले), 154- धनप्रद (सबको धन देने वाले), 155- हरिमेध (आप भगवान के भक्त हैं), 156- यम, 157- नियम, 158- महानियम आदि साधन भी आप ही हैं। 159- कृच्छ्र, 160- अतिकृच्छ्र, 161- महाकृच्छ्र, 162- सर्वकृच्छ्र आदि चान्द्रायणव्रत भी आप ही हैं। , 173- महाविभूति (जो सृष्टि के रूप में शक्तिशाली हैं), 174- महात्म्यशरीर (जिनका रूप अतुलनीय है), 175- पवित्र, 176- महापवित्र (जो पवित्र लोगों को भी पवित्र कर देते हैं), 177- हिरण्यमय, 178- बृहद् (ब्रह्म), 179- अप्रतर्क्य (तर्क से न जाने योग्य), 180- अजेय, 181- ब्रह्मग्रह, 182- प्रजा के रचयिता, 183- प्रजा का संहार करने वाले, 184- महामायाधर, 185- चित्रशिखंडी, 186- वरप्रदा, 187- पुरोडाश भाग को ग्रहण करने वाले, 188- गताध्वर (प्राप्ति यज्ञ), 189- छिन्नतृष्ण (तृष्णा रहित), 190-छिन्नसंशय (संशय रहित), 191-सर्वतोवृत्त (सर्वव्यापी), 192-निवृत्तिरूप, 193-ब्राह्मणरूप, 194-ब्रह्मप्रिय, 195-विश्वमूर्ति, 196-महामूर्ति, 197-बान्धव (जगत के मित्र), 198-भक्तवत्सल और 199-ब्रह्मण्यदेव आदि नामों से पुकारे जाने वाले भगवान् आपको नमस्कार है। मैं आपका भक्त हूँ। आपके दर्शन की इच्छा से मैं यहाँ आया हूँ। 200-एकान्त में दर्शन देने वाले भगवान् को बारंबार नमस्कार है।4॥
 
1-Devdevesh! Salutations to you. 2-You are inactive, 3-Nirguna (without attributes) and 4-You are the witness of the entire universe. 5-Kshetragya, 6-Purushottam (better than Kshar-Akshar Purush), 7-Anant, 8-Purush, 9-Mahapurusha, 10-Purushottam (God), 11-Triguna, 12-Pradhaan, 13-Amrit, 14-Amritakhya, 15-Anantakhya (Sheshnagarup), 16-Vyom (Mahakasharup), 17-Sanatan, 18-Sadasadvyaktavyakta, 19-Ritadhaama (form of Satyadham), 20-Adidev, 21-Vasuprad (giver of fruits of action), 22-Prajapate (skilled etc.), 23-Suprajapate (best among Prajapatis), 24-Vanaspate, 25-Mahaprajapate (form of Brahma), 26-Urjaspate. (Super powerful), 27-Vachspate (Jupiter), 28-Jagatpate, 29-Manaspate, 30-Divaspate (Sun), 31-Marutpate (lord of Vayudevta), 32-Salipate (lord of water), 33-Prithvipate, 34-Dikpate, 35-Purvanivasa (base form of the world at the time of Mahapralaya), 36-Guhya (Swarup), 37-Brahmapurohit, 38-Brahmakayik, 39-Maharajik, 40-Chaturmaharajik, 41-Bhasur (Lightful), 42-Mahabhasur (Great Light), 43-Saptamahabhag, 44-Yamya, 45-Mahayamya, 46-Sanjnyasangya, 47-Tushit, 48-Mahatushit, 49-Pramardan (death form), 50-Constructed, 51-Unchanged, 52-Vashvarti, 53-Aparinindit (full of Shamdam etc. qualities), 54-Infinite (infinite), 55-Vashvarti, 56-Avashvarti, 57-Yagya, 58-MahaYagya, 59-YagyaSambhava, 60-YagyaYoni (Vedasvarupa), 61-YagyaGarbha, 62-YagyaHridaya, 63-Yagyastut, 64-Yagyabhaghar, 65-Panchayagya, 66-Panchakaalkartripati (Lord of Ahoratri, month, season, ayana and Samvatsar form of time), 67-Panchratrik, 68-Vaikuntha (Paramdham), 69-Aparajit, 70-Manasik, 71-Nanamik (which includes all the names), 72-Paraswami (God), 73-Susnat, 74-Hamsa, 75-Paramahamsa, 76-Mahahamsa, 77-Paramayagnik, 78-Sankhyayogarupa, 79-Sankhyamurthy (Gyanmurthy), 80-Amriteshay (Vishnu), 81-Hiranyeshay, 82-Deveshay, 83-Kusheshay, 84-Brahmeshay, 85-Padmeshay (Vishnu), 86-Vishweshwar and 87-Vishvaksena etc. are your names. 88-You are the Jagdanvaya (imbued in the world) and 89-You are the reason for the world. 90-Fire is your mouth. 91-You are the form of Barvanal, 92-You are the form of sacrifice, 93-The charioteer, 94-Vashatkar, 95-Omkar, 96-The form of penance, 97-The form of mind, 98-The form of moon, 99-You are the Sun, the god of eyes. 100-Surya, 101-Diggaja, 102-Digbhanu (illuminator of directions), 103-Vidigbhanu (illuminator of various directions) and 104-Hayagrivarupa. 105-You are the first person to chant Trisauparna mantra, 106-bearer of Brahmin characters and 107-are the form of Panchagni. 108-You are also the famous triple fire by the name Nachiket. 109-You are the storehouse of six organs named Shiksha, Kalpa, Grammar, Chhand, Nirukta and Jyotish. 110-You are the form of Pragjyotisha, 111-You are the form of the eldest material. 112-Samik Vratdhari, 113-Atharvashira, 114-Panchmahakalrup (You are the worshiper of Saur, Shakta, Ganapatya, Shaiva and Vaishnav scriptures). 115-Fenpacharya, 116-Valakhilya Munirup, 117-You are the Vaikhanas Munirup. 118-Abhagnayoga (Unbroken Yoga), 119-Abhagnaparisankhyan (unbroken thoughts), 120-Yugaadi (primordial form of the era), 121-Yugamadhya (middle form of the era), 122-Yugant (You are the embodiment of the era), 123-Aakhandal (Indra), 124-You are the ancient womb, 125-KaushikMuni, 126-Purustut (worthy of being praised abundantly by all), , 137- Vratavas (shelter of fasting), 138- Samudravas (shelter of milk), 139- Yashovas, (abode of passion), 140- Tapovas (abode of penance), 141- Damavas (base of restraint), 142- Lakshminivas, 143- Base of knowledge, 144- Base of fame, 145- Shelter of wealth, 146- Sarvavas (abode of all), 147- Vasudev, , 153- Sukhprad (provider of happiness to all), 154- Dhanprad (giver of wealth to all), 155- Harimedh (you are the devotee of God), 156- Yama, 157- Niyam, 158- Mahaniyam etc. means are also you. 159- Krichchhra, 160- Atikrichchhra, 161- Mahakrichchhra, 162- Sarvakrichchhra etc. Chandrayanvrat are also you. , 173- Mahavibhuti (one who is powerful in the form of creation), 174- Mahaatmyasarir (one who has incomparable impressive form), 175- Pious, 176- Mahapavitra (one who purifies even the pious), 177- Hiranyamay, 178-Brihad (Brahm), 179-Apratarkya (not able to be known through logic), 180-Invincible, 181-Brahmagra᥺, 182-Creator of the people, 183-One who destroys the people, 184-Mahamayadhar, 185-Chitrashikhandi, 186-Varaprada, 187-One who accepts the Purodash part, 188-Gatadhvar (Attainment Yagya), 189-Chhinnatrishna (without craving), 190-Chhinnasamshay (without doubt), 191-Sarvatovritta (universal), 192-Nivrittirupa, 193-Brahminrupa, 194-Brahmanpriya, 195-Vishwamurti, God who is called by names like 196-Mahamurthy, 197-Bandhav (Friend of the world), 198-Bhaktavatsal and 199-Brahmanyadev etc. Greetings to you. I am your devotee. I have come here with the desire to see you. 200-Salutations again and again to the God who gives darshan in solitude.4॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि अष्टत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३३८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें तीन सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३८॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)