श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 337: यज्ञमें आहुतिके लिये अजका अर्थ अन्न है, बकरा नहीं—इस बातको जानते हुए भी पक्षपात करनेके कारण राजा उपरिचरके अध:पतनकी और भगवत्कृपासे उनके पुनरुत्थानकी कथा  »  श्लोक 9-10h
 
 
श्लोक  12.337.9-10h 
कथंस्विदन्यथा ब्रूयादेष वाक्यं महान् वसु:।
एवं ते संविदं कृत्वा विबुधा ऋषयस्तथा॥ ९॥
अपृच्छन् सहिताभ्येत्य वसुं राजानमन्तिकात्।
 
 
अनुवाद
ये महापुरुष वसु शास्त्रविरुद्ध वचन कैसे बोल सकते हैं?’ इस प्रकार सहमत होकर देवता और ऋषिगण मिलकर राजा वसु के पास आए और अपना प्रश्न प्रस्तुत किया -॥9 1/2॥
 
'How can this great man Vasu speak words contrary to the scriptures?' Having agreed thus, the gods and sages together came to king Vasu and presented their question -॥9 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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