श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 337: यज्ञमें आहुतिके लिये अजका अर्थ अन्न है, बकरा नहीं—इस बातको जानते हुए भी पक्षपात करनेके कारण राजा उपरिचरके अध:पतनकी और भगवत्कृपासे उनके पुनरुत्थानकी कथा  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.337.5 
नैष धर्म: सतां देवा यत्र वध्येत वै पशु:।
इदं कृतयुगं श्रेष्ठं कथं वध्येत वै पशु:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
हे देवताओं! जहाँ कहीं भी यज्ञ में पशु-वध होता है, वह सत्पुरुषों का धर्म नहीं है। यह श्रेष्ठ सत्ययुग है। इस युग में पशु-वध कैसे हो सकता है?
 
O Gods! Wherever animals are slaughtered in sacrifices, it is not the religion of good men. This is the best Satya Yuga. How can animals be slaughtered in this age?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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