श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 337: यज्ञमें आहुतिके लिये अजका अर्थ अन्न है, बकरा नहीं—इस बातको जानते हुए भी पक्षपात करनेके कारण राजा उपरिचरके अध:पतनकी और भगवत्कृपासे उनके पुनरुत्थानकी कथा  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  12.337.41 
भीष्म उवाच
एतत् ते सर्वमाख्यातं सम्भूता मानवा यथा।
नारदोऽपि यथा श्वेतं द्वीपं स गतवानृषि:।
तत् ते सर्वं प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमना नृप॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं- युधिष्ठिर! मैंने श्वेतद्वीपवासियों का हाल तुम्हें ज्यों का त्यों बता दिया। अब मैं तुम्हें देवर्षि नारद के श्वेतद्वीप में जाने का पूरा वृत्तांत सुनाता हूँ। तुम एकाग्रचित्त होकर उसे सुनो।
 
Bhishmaji says- Yudhishthira! I have told you the condition of the residents of Shwetdvipa as they are. Now I will tell you the entire story of how Devarshi Narada went to Shwetdvipa. Listen to him with full concentration.
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये सप्तत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३३७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाका वर्णनविषयक तीन सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३७॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४२ श्लोक हैं)
 
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd