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mahabharat 12.337.40: फिर उसने परम पुरुष भगवान् हरि को ही भस्म कर दिया और इस प्रकार वह शीघ्र ही उस शाप से मुक्त होकर ब्रह्मलोक में पहुँच गया ॥40॥   |   mahabharat अध्याय 12.337: यज्ञमें आहुतिके लिये अजका अर्थ अन्न है, बकरा नहीं—इस बातको जानते हुए भी पक्षपात करनेके कारण राजा उपरिचरके अध:पतनकी और भगवत्कृपासे उनके पुनरुत्थानकी कथा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 337: यज्ञमें आहुतिके लिये अजका अर्थ अन्न है, बकरा नहीं—इस बातको जानते हुए भी पक्षपात करनेके कारण राजा उपरिचरके अध:पतनकी और भगवत्कृपासे उनके पुनरुत्थानकी कथा  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  12.337.40 
केवलं पुरुषस्तेन सेवितो हरिरीश्वर:।
तत: शीघ्रं जहौ शापं ब्रह्मलोकमवाप च॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
फिर उसने परम पुरुष भगवान् हरि को ही भस्म कर दिया और इस प्रकार वह शीघ्र ही उस शाप से मुक्त होकर ब्रह्मलोक में पहुँच गया ॥40॥
 
Then he consumed only the Supreme Being Lord Hari, who was the supreme male, and thus he was soon freed from that curse and reached Brahmaloka. ॥ 40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)