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mahabharat 12.337.36: यह आदेश पाते ही गरुड़ वायु के समान वेगवान होकर अपने पंख फैलाकर उड़ चले और पाताल लोक में प्रवेश कर गए, जहां राजा वसु विराजमान थे।   |   mahabharat अध्याय 12.337: यज्ञमें आहुतिके लिये अजका अर्थ अन्न है, बकरा नहीं—इस बातको जानते हुए भी पक्षपात करनेके कारण राजा उपरिचरके अध:पतनकी और भगवत्कृपासे उनके पुनरुत्थानकी कथा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 337: यज्ञमें आहुतिके लिये अजका अर्थ अन्न है, बकरा नहीं—इस बातको जानते हुए भी पक्षपात करनेके कारण राजा उपरिचरके अध:पतनकी और भगवत्कृपासे उनके पुनरुत्थानकी कथा  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  12.337.36 
गरुत्मानथ विक्षिप्य पक्षौ मारुतवेगवान्।
विवेश विवरं भूमेर्यत्रास्ते पार्थिवो वसु:॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
यह आदेश पाते ही गरुड़ वायु के समान वेगवान होकर अपने पंख फैलाकर उड़ चले और पाताल लोक में प्रवेश कर गए, जहां राजा वसु विराजमान थे।
 
On receiving this order, Garuda, as swift as the wind, spread his wings and flew and entered the netherworld where King Vasu was seated.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)