श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 337: यज्ञमें आहुतिके लिये अजका अर्थ अन्न है, बकरा नहीं—इस बातको जानते हुए भी पक्षपात करनेके कारण राजा उपरिचरके अध:पतनकी और भगवत्कृपासे उनके पुनरुत्थानकी कथा  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.337.35 
भूमेर्विवरसंगुप्तं गरुडेह ममाज्ञया।
अधश्चरं नृपश्रेष्ठं खेचरं कुरु मा चिरम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
गरुड़! हे पाताल के श्रेष्ठ वसुओं, जो पृथ्वी के भीतर सुरक्षित रहते हैं, मेरी आज्ञा से उन्हें शीघ्र ही आकाशगामी बना दो॥35॥
 
'Garuda! O great Vasu of the underworld, who live safely in the depths of the earth, make them sky-carriers soon with my permission. 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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