श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 337: यज्ञमें आहुतिके लिये अजका अर्थ अन्न है, बकरा नहीं—इस बातको जानते हुए भी पक्षपात करनेके कारण राजा उपरिचरके अध:पतनकी और भगवत्कृपासे उनके पुनरुत्थानकी कथा  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  12.337.30 
तत्रापि पञ्चभिर्यज्ञै: पञ्चकालानरिंदम।
अयजद्धरिं सुरपतिं भूमेर्विवरगोऽपि सन्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
शत्रुनाशक युधिष्ठिर! नरक की गुफा में रहते हुए भी राजा उपरिचर प्रतिदिन पाँच बार पाँच यज्ञ करके देवताओं के स्वामी श्री हरि की पूजा करते थे॥30॥
 
Enemy-destroyer Yudhishthir! Even while residing in the cave of hell, King Uparichara used to worship the lord of gods Shri Hari by performing five yagnas five times a day. ॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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