श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 337: यज्ञमें आहुतिके लिये अजका अर्थ अन्न है, बकरा नहीं—इस बातको जानते हुए भी पक्षपात करनेके कारण राजा उपरिचरके अध:पतनकी और भगवत्कृपासे उनके पुनरुत्थानकी कथा  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  12.337.29 
चक्रे वसुस्तत: पूजां विष्वक्सेनाय भारत।
जप्यं जगौ च सततं नारायणमुखोद्‍गतम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात वसु भगवान विश्वक्सेन की पूजा करने लगे और भगवान नारायण के मुख से प्रकट हुए जपने योग्य मंत्र (ॐ नमो नारायणाय) का निरन्तर जप करने लगे॥29॥
 
India Thereafter Vasu started worshiping Lord Vishvaksena and started continuously chanting the chantable mantra (Om Namo Narayanay) that appeared from the mouth of Lord Narayana. 29॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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