श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 337: यज्ञमें आहुतिके लिये अजका अर्थ अन्न है, बकरा नहीं—इस बातको जानते हुए भी पक्षपात करनेके कारण राजा उपरिचरके अध:पतनकी और भगवत्कृपासे उनके पुनरुत्थानकी कथा  »  श्लोक 26-27
 
 
श्लोक  12.337.26-27 
प्राप्स्यसेऽस्मदनुध्यानान्मा च त्वां ग्लानिरस्पृशत्।
न क्षुत्पिपासे राजेन्द्र भूमेश्छिद्रे भविष्यत:॥ २६॥
वसोर्धाराभिपीतत्वात् तेजसाऽऽप्यायितेन च।
स देवोऽस्मद्वरात् प्रीतो ब्रह्मलोकं हि नेष्यति॥ २७॥
 
 
अनुवाद
‘राजेन्द्र! हमारा चिंतन करने से तुम्हें वसुधारा प्राप्त होगी, जिससे तुम्हें अपराध बोध स्पर्श भी नहीं कर सकेगा और इस पाताल लोक में रहते हुए भी तुम्हें भूख-प्यास नहीं लगेगी; क्योंकि वसुधारा का पान करने से तुम्हारा तेज निरन्तर बढ़ता रहेगा। भगवान श्रीहरि हमारे आशीर्वाद से प्रसन्न होंगे और तुम्हें ब्रह्मलोक ले जाएँगे।’
 
‘Rajendra! By thinking about us you will get Vasudhara, due to which guilt will not be able to touch you and even while living in this netherworld you will not suffer from hunger and thirst; because by drinking Vasudhara your radiance will keep on increasing. Lord Shri Hari will be pleased with our blessings and will take you to Brahmaloka.’
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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