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mahabharat 12.336.43-44: किन्तु हमने एक शब्द भी सुना जो जोर से बोला जा रहा था और दूर-दूर तक फैल रहा था। सब लोग कह रहे थे- 'पुण्डरीकाक्ष! आपकी जय हो। विश्वभवन! आपको नमस्कार है। हे महापुरुषों के भी पूर्वज हृषीकेश! आपको नमस्कार है।'॥43-44॥   |   mahabharat अध्याय 12.336: राजा उपरिचरके यज्ञमें भगवान्पर बृहस्पतिका क्रोधित होना, एकत आदि मुनियोंका बृहस्पतिसे श्वेतद्वीप एवं भगवान् की महिमाका वर्णन करके उनको शान्त करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 336: राजा उपरिचरके यज्ञमें भगवान्पर बृहस्पतिका क्रोधित होना, एकत आदि मुनियोंका बृहस्पतिसे श्वेतद्वीप एवं भगवान् की महिमाका वर्णन करके उनको शान्त करना  »  श्लोक 43-44
 
 
श्लोक  12.336.43-44 
एकस्तु शब्दो वितत: श्रुतोऽस्माभिरुदीरित:॥ ४३॥
जितं ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन।
नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुषपूर्वज॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
किन्तु हमने एक शब्द भी सुना जो जोर से बोला जा रहा था और दूर-दूर तक फैल रहा था। सब लोग कह रहे थे- 'पुण्डरीकाक्ष! आपकी जय हो। विश्वभवन! आपको नमस्कार है। हे महापुरुषों के भी पूर्वज हृषीकेश! आपको नमस्कार है।'॥43-44॥
 
‘But we also heard a word which was being uttered loudly and was spreading far and wide. Everyone was saying- ‘Pundarikaksha! Victory to you. Vishwabhavan! Salutations to you. Hrishikesh, the ancestor of even great men! Salutations to you.’॥ 43-44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)