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mahabharat 12.336.34-35: तत्पश्चात् हमने पुनः सौ वर्षों तक घोर तप किया। उस तपपूर्ण व्रत के पूर्ण होने पर हमने वहाँ शुभ पुरुषों को देखा, जो चन्द्रमा के समान गौर वर्ण वाले तथा सभी प्रकार के उत्तम गुणों से युक्त थे। 34-35.   |   mahabharat अध्याय 12.336: राजा उपरिचरके यज्ञमें भगवान्पर बृहस्पतिका क्रोधित होना, एकत आदि मुनियोंका बृहस्पतिसे श्वेतद्वीप एवं भगवान् की महिमाका वर्णन करके उनको शान्त करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 336: राजा उपरिचरके यज्ञमें भगवान्पर बृहस्पतिका क्रोधित होना, एकत आदि मुनियोंका बृहस्पतिसे श्वेतद्वीप एवं भगवान् की महिमाका वर्णन करके उनको शान्त करना  »  श्लोक 34-35
 
 
श्लोक  12.336.34-35 
तत: पुनर्वर्षशतं तप्त्वा तात्कालिकं महत्॥ ३४॥
व्रतावसाने च शुभान् नरान् ददृशिरे वयम्।
श्वेतांश्चन्द्रप्रतीकाशान् सर्वलक्षणलक्षितान्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् हमने पुनः सौ वर्षों तक घोर तप किया। उस तपपूर्ण व्रत के पूर्ण होने पर हमने वहाँ शुभ पुरुषों को देखा, जो चन्द्रमा के समान गौर वर्ण वाले तथा सभी प्रकार के उत्तम गुणों से युक्त थे। 34-35.
 
‘Thereafter we again performed a great penance for a hundred years. On completion of that penance-filled vow, we saw the auspicious men there, who were fair-skinned like the moon and were blessed with all kinds of good characteristics. 34-35.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)