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mahabharat 12.336.11: वे शुद्ध, उदार, हिंसा से रहित और इच्छाओं से मुक्त थे और इस प्रकार अपने कर्तव्यों का पालन करते थे। उस यज्ञ में देवताओं का भाग निर्धारित करने के लिए वन में उगने वाले फल, मूल और अन्य वस्तुओं का उपयोग किया जाता था।   |   mahabharat अध्याय 12.336: राजा उपरिचरके यज्ञमें भगवान्पर बृहस्पतिका क्रोधित होना, एकत आदि मुनियोंका बृहस्पतिसे श्वेतद्वीप एवं भगवान् की महिमाका वर्णन करके उनको शान्त करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 336: राजा उपरिचरके यज्ञमें भगवान्पर बृहस्पतिका क्रोधित होना, एकत आदि मुनियोंका बृहस्पतिसे श्वेतद्वीप एवं भगवान् की महिमाका वर्णन करके उनको शान्त करना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.336.11 
अहिंस्र: शुचिरक्षुद्रो निराशी: कर्मसंस्तुत:।
आरण्यकपदोद्भूता भागास्तत्रोपकल्पिता:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
वे शुद्ध, उदार, हिंसा से रहित और इच्छाओं से मुक्त थे और इस प्रकार अपने कर्तव्यों का पालन करते थे। उस यज्ञ में देवताओं का भाग निर्धारित करने के लिए वन में उगने वाले फल, मूल और अन्य वस्तुओं का उपयोग किया जाता था।
 
They were pure, generous and devoid of any violent feelings and were free from desires and thus they performed their duties. The fruits, roots and other things grown in the forest were used to determine the shares of the gods in that yajna.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)