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mahabharat 12.335.46-47: ‘द्विजश्रेष्ठगण! जब स्वायम्भुव मनु के धर्मग्रंथ, शुक्राचार्य के धर्मग्रंथ और बृहस्पति के उपदेश संसार में प्रचारित हो जाएँगे, तब प्रजापालक वसु (राजा उपरिचर) बृहस्पतिजी से आपके द्वारा बनाए गए इस धर्मग्रंथ का अध्ययन करेंगे। 46-47॥   |   mahabharat अध्याय 12.335: नारदजीका श्वेतद्वीपदर्शन, वहाँके निवासियोंके स्वरूपका वर्णन, राजा उपरिचरका चरित्र तथा पाञ्चरात्रकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 335: नारदजीका श्वेतद्वीपदर्शन, वहाँके निवासियोंके स्वरूपका वर्णन, राजा उपरिचरका चरित्र तथा पाञ्चरात्रकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग  »  श्लोक 46-47
 
 
श्लोक  12.335.46-47 
स्वायम्भुवेषु धर्मेषु शास्त्रे चौशनसे कृते।
बृहस्पतिमते चैव लोकेषु प्रतिचारिते॥ ४६॥
युष्मत्कृतमिदं शास्त्रं प्रजापालो वसुस्तत:।
बृहस्पतिसकाशाद् वै प्राप्स्यते द्विजसत्तमा:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
‘द्विजश्रेष्ठगण! जब स्वायम्भुव मनु के धर्मग्रंथ, शुक्राचार्य के धर्मग्रंथ और बृहस्पति के उपदेश संसार में प्रचारित हो जाएँगे, तब प्रजापालक वसु (राजा उपरिचर) बृहस्पतिजी से आपके द्वारा बनाए गए इस धर्मग्रंथ का अध्ययन करेंगे। 46-47॥
 
‘Dwijashresthagan! When the religious scriptures of Swayambhuva Manu, the scriptures of Shukracharya and the teachings of Brihaspati will be publicized in the world, then Prajapalak Vasu (King Uparichar) will study this scripture made by you from Brihaspatiji. 46-47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)