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mahabharat 12.335.3: लोकनाथ! मैं सदैव अपने से बड़ों का आदर करता हूँ। मैंने कभी किसी का रहस्य दूसरों को नहीं बताया। मैंने वेदों का अध्ययन किया है, तप किया है और कभी झूठ नहीं बोला।   |   mahabharat अध्याय 12.335: नारदजीका श्वेतद्वीपदर्शन, वहाँके निवासियोंके स्वरूपका वर्णन, राजा उपरिचरका चरित्र तथा पाञ्चरात्रकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 335: नारदजीका श्वेतद्वीपदर्शन, वहाँके निवासियोंके स्वरूपका वर्णन, राजा उपरिचरका चरित्र तथा पाञ्चरात्रकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.335.3 
पूजां गुरूणां सततं करोमि
परस्य गुह्यं न तु भिन्नपूर्वम्।
वेदा: स्वधीता मम लोकनाथ
तप्तं तपो नानृतमुक्तपूर्वम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
लोकनाथ! मैं सदैव अपने से बड़ों का आदर करता हूँ। मैंने कभी किसी का रहस्य दूसरों को नहीं बताया। मैंने वेदों का अध्ययन किया है, तप किया है और कभी झूठ नहीं बोला।
 
Loknath! I always respect my elders. I have never revealed anyone's secrets to others. I have studied the Vedas, performed penance and have never spoken a lie. 3.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)