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mahabharat 12.335.22: भगवान नारायण की भक्ति करने वाले उस शत्रु राजा पर देवराज इन्द्र प्रसन्न थे। देवराज इन्द्र उसे अपने साथ शय्या और आसन पर बिठाते थे। 22॥   |   mahabharat अध्याय 12.335: नारदजीका श्वेतद्वीपदर्शन, वहाँके निवासियोंके स्वरूपका वर्णन, राजा उपरिचरका चरित्र तथा पाञ्चरात्रकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 335: नारदजीका श्वेतद्वीपदर्शन, वहाँके निवासियोंके स्वरूपका वर्णन, राजा उपरिचरका चरित्र तथा पाञ्चरात्रकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.335.22 
तस्य नारायणे भक्तिं वहतोऽमित्रकर्षिण:।
एकशय्यासनं देवो दत्तवान् देवराट् स्वयम्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
भगवान नारायण की भक्ति करने वाले उस शत्रु राजा पर देवराज इन्द्र प्रसन्न थे। देवराज इन्द्र उसे अपने साथ शय्या और आसन पर बिठाते थे। 22॥
 
Devraj Indra was pleased with that enemy king who had devotion to Lord Narayana. Devraj Indra used to make him sit on a bed and a seat with him. 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)