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mahabharat 12.335.21: वह आदि, मध्य और अन्त से रहित, जगत् के सनातन रचयिता जनार्दन की भक्ति में पूर्णतया तत्पर था ॥21॥   |   mahabharat अध्याय 12.335: नारदजीका श्वेतद्वीपदर्शन, वहाँके निवासियोंके स्वरूपका वर्णन, राजा उपरिचरका चरित्र तथा पाञ्चरात्रकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 335: नारदजीका श्वेतद्वीपदर्शन, वहाँके निवासियोंके स्वरूपका वर्णन, राजा उपरिचरका चरित्र तथा पाञ्चरात्रकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.335.21 
सर्वभावेन भक्त: स देवदेवं जनार्दनम्।
अनादिमध्यनिधनं लोककर्तारमव्ययम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
वह आदि, मध्य और अन्त से रहित, जगत् के सनातन रचयिता जनार्दन की भक्ति में पूर्णतया तत्पर था ॥21॥
 
He was completely engaged in the worship of Janardan, the eternal creator of the world, without beginning, middle or end. 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)