Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.334.29-31: जो सूक्ष्म, अज्ञेय, अव्यक्त, स्थावर और नित्य है, जो इन्द्रियों, विषयों और समस्त भूतों से परे है, वही समस्त प्राणियों का अन्तरात्मा है; इसलिए उसे क्षेत्रप्य नाम से पुकारा जाता है, उसे त्रिगुणातीत और पुरुष कहा जाता है। उसी से त्रिगुणमय अव्यक्त की उत्पत्ति हुई है। द्विजश्रेष्ठ! उसे व्यक्त रूप में स्थित अविनाशी अव्यक्त प्रकृति कहा गया है। 29-31॥ | mahabharat अध्याय 12.334: बदरिकाश्रममें नारदजीके पूछनेपर भगवान् नारायणका परमदेव परमात्माको ही सर्वश्रेष्ठ पूजनीय बताना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
जो सूक्ष्म, अज्ञेय, अव्यक्त, स्थावर और नित्य है, जो इन्द्रियों, विषयों और समस्त भूतों से परे है, वही समस्त प्राणियों का अन्तरात्मा है; इसलिए उसे क्षेत्रप्य नाम से पुकारा जाता है, उसे त्रिगुणातीत और पुरुष कहा जाता है। उसी से त्रिगुणमय अव्यक्त की उत्पत्ति हुई है। द्विजश्रेष्ठ! उसे व्यक्त रूप में स्थित अविनाशी अव्यक्त प्रकृति कहा गया है। 29-31॥
That which is subtle, unknowable, unmanifested, immovable and permanent, which is beyond the senses, objects and all existences, is the inner soul of all living beings; Hence, it is called by the name Kshetrapya, he is called Trigunatit and Purusha. From that the Trigunamaya Avyakta has originated. Dwijshreshtha! It has been called the indestructible unmanifested nature situated in the expressed form. 29-31॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥