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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 334: बदरिकाश्रममें नारदजीके पूछनेपर भगवान् नारायणका परमदेव परमात्माको ही सर्वश्रेष्ठ पूजनीय बताना  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  12.334.11-12 
अष्टचक्रं हि तद् यानं भूतयुक्तं मनोरमम्।
तत्राद्यौ लोकनाथौ तौ कृशौ धमनिसंततौ॥ ११॥
तपसा तेजसा चैव दुर्निरीक्ष्यौ सुरैरपि।
यस्य प्रसादं कुर्वाते स देवौ द्रष्टुमर्हति॥ १२॥
 
 
अनुवाद
उनके सुंदर रथ में आठ पहिये थे और उसमें अनेक प्राणी जुते हुए थे। दोनों आदिपुरुष जगदीश्वर तपस्या करते-करते अत्यंत दुर्बल हो गए। उनके शरीर की नसें उभरने लगीं। तपस्या के कारण उनका तेज इतना बढ़ गया था कि देवताओं के लिए भी उनकी ओर देखना कठिन हो रहा था। केवल वे ही जिन पर उनकी कृपा होती थी, उन दोनों देवेश्वरों के दर्शन कर पाते थे।
 
Their beautiful chariot had eight wheels and many creatures were harnessed in it. Both the Adipurush Jagadishvara became very weak while performing penance. The veins of their bodies started showing. Their brilliance had increased so much due to penance that it was becoming difficult for even the gods to look at them. Only those on whom they showered their blessings could have the darshan of those two Deveshwaras.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)