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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 333: शुकदेवजीकी परमपद-प्राप्ति तथा पुत्र-शोकसे व्याकुल व्यासजीको महादेवजीका आश्वासन देना
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श्लोक 41
श्लोक
12.333.41
एतदाचष्ट मे राजन् देवर्षिर्नारद: पुरा।
व्यासश्चैव महायोगी संजल्पेषु पदे पदे॥ ४१॥
अनुवाद
राजन! देवर्षि नारदजी ने सबसे पहले मुझे यह कथा सुनाई थी। महायोगी व्यासजी भी अपनी बातचीत में पग-पग पर इस कथा को दोहराते हैं ॥ 41॥
King! Devarshi Naradji was the first one to tell me this story. Even the great yogi Vyasji repeats this story at every step of his conversation. ॥ 41॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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