श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 333: शुकदेवजीकी परमपद-प्राप्ति तथा पुत्र-शोकसे व्याकुल व्यासजीको महादेवजीका आश्वासन देना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.333.3 
ततस्तस्मिन् पदे नित्ये निर्गुणे लिङ्गवर्जिते।
ब्रह्मणि प्रत्यतिष्ठत् स विधूमोऽग्निरिव ज्वलन्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् वे सनातन निराकार और लिंगरहित ब्रह्मपद में स्थित हो गए। उस समय उनका तेज धूमरहित अग्नि के समान चमक रहा था॥3॥
 
Thereafter he became situated in the eternal formless and genderless Brahmapad. At that time his brilliance was shining like a smokeless fire.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)