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mahabharat 12.333.17-18h: बहुत सी अप्सराएँ जल में स्नान और क्रीड़ा कर रही थीं। यद्यपि वे नग्न थीं, तथापि शुकदेवजी को शून्य (बाह्य ज्ञान से रहित और आत्मकेन्द्रित) रूप में देखकर उन्होंने अपने शरीर को ढकने या छिपाने का प्रयत्न नहीं किया।   |   mahabharat अध्याय 12.333: शुकदेवजीकी परमपद-प्राप्ति तथा पुत्र-शोकसे व्याकुल व्यासजीको महादेवजीका आश्वासन देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 333: शुकदेवजीकी परमपद-प्राप्ति तथा पुत्र-शोकसे व्याकुल व्यासजीको महादेवजीका आश्वासन देना  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  12.333.17-18h 
तस्यां क्रीडन्त्यभिरतास्ते चैवाप्सरसां गणा:॥ १७॥
शून्याकारं निराकारा: शुकं दृष्ट्वा विवासस:।
 
 
अनुवाद
बहुत सी अप्सराएँ जल में स्नान और क्रीड़ा कर रही थीं। यद्यपि वे नग्न थीं, तथापि शुकदेवजी को शून्य (बाह्य ज्ञान से रहित और आत्मकेन्द्रित) रूप में देखकर उन्होंने अपने शरीर को ढकने या छिपाने का प्रयत्न नहीं किया।
 
Many Apsaras were bathing and playing in the water. Though they were naked, yet on seeing Shukdevji in the form of a void (devoid of external knowledge and self-centered), they did not try to cover or hide their bodies.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)