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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 333: शुकदेवजीकी परमपद-प्राप्ति तथा पुत्र-शोकसे व्याकुल व्यासजीको महादेवजीका आश्वासन देना  »  श्लोक 10-11h
 
 
श्लोक  12.333.10-11h 
सोऽविशङ्केन मनसा तदैवाभ्यपतच्छुक:।
तत: पर्वतशृङ्गे द्वे सहसैव द्विधाकृते॥ १०॥
अदृश्येतां महाराज तदद्भुतमिवाभवत्।
 
 
अनुवाद
उन्हें देखकर वह पहले की तरह निःसंकोच उन पर चढ़ गया। तभी पर्वत की दोनों चोटियाँ अचानक दो भागों में विभक्त हो गईं और बीच में से फटी हुई प्रतीत हुईं। महाराज! यह अद्भुत बात थी।
 
Seeing them, he climbed them without any doubt as before. Then both the peaks of the mountain suddenly split into two parts and appeared to be torn in the middle. Maharaj! This was an amazing thing. 10 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)