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mahabharat 12.332.9-10: नारदजी की आज्ञा पाकर व्यासकुमार शुकदेवजी ने उन्हें प्रणाम किया और पुनः योगपूर्वक आकाश में प्रवेश कर गए। कैलाश शिखर से कूदकर वे तत्काल आकाश में पहुँच गए और निश्चयपूर्वक ज्ञान प्राप्त करके वायु का रूप धारण करके श्री शुकदेवजी अंतरिक्ष में विचरण करने लगे।   |   mahabharat अध्याय 12.332: शुकदेवजीकी ऊर्ध्वगतिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 332: शुकदेवजीकी ऊर्ध्वगतिका वर्णन  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  12.332.9-10 
नारदेनाभ्यनुज्ञात: शुको द्वैपायनात्मज:।
अभिवाद्य पुनर्योगमास्थायाकाशमाविशत्॥ ९॥
कैलासपृष्ठादुत्पत्य स पपात दिवं तदा।
अन्तरिक्षचर: श्रीमान् वायुभूत: सुनिश्चित:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
नारदजी की आज्ञा पाकर व्यासकुमार शुकदेवजी ने उन्हें प्रणाम किया और पुनः योगपूर्वक आकाश में प्रवेश कर गए। कैलाश शिखर से कूदकर वे तत्काल आकाश में पहुँच गए और निश्चयपूर्वक ज्ञान प्राप्त करके वायु का रूप धारण करके श्री शुकदेवजी अंतरिक्ष में विचरण करने लगे।
 
After receiving Naradji's permission, Vyaskumar Shukdevji bowed to him and again entered the sky in yoga. Jumping from the peak of Kailash, he immediately reached the sky and after getting the sure knowledge, taking the form of Vayu, Shri Shukdev started roaming in the space. 9-10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)