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mahabharat 12.332.24: वह बड़ा तपस्वी, पितृभक्त और पिता का अत्यन्त प्रिय पुत्र था। उसका मन सदैव इसी में लगा रहता था; फिर भी पिता ने उसे जाने की अनुमति कैसे दी?॥24॥   |   mahabharat अध्याय 12.332: शुकदेवजीकी ऊर्ध्वगतिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 332: शुकदेवजीकी ऊर्ध्वगतिका वर्णन  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  12.332.24 
पितृभक्तो दृढतपा: पितु: सुदयित: सुत:।
अनन्यमनसा तेन कथं पित्रा विसर्जित:॥ २४॥
 
 
अनुवाद
वह बड़ा तपस्वी, पितृभक्त और पिता का अत्यन्त प्रिय पुत्र था। उसका मन सदैव इसी में लगा रहता था; फिर भी पिता ने उसे जाने की अनुमति कैसे दी?॥24॥
 
‘He was a great ascetic and a devotee of his father and was a very beloved son of his father. His mind was always engaged in this; yet how did he give him permission to go?’॥ 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)