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mahabharat 12.332.22-23: ब्रह्मर्षि व्यासजी के पुत्र की उत्तम गति देखकर वे दोनों आश्चर्यचकित हो गए । वे आपस में कहने लगे, 'अहा ! इस वेदज्ञ ब्राह्मण की बुद्धि में एकाग्रता कैसी अद्भुत है ? पिता की सेवा से अल्पकाल में ही उत्तम बुद्धि प्राप्त करके यह चन्द्रमा के समान आकाश में विचरण कर रहा है । 22-23॥   |   mahabharat अध्याय 12.332: शुकदेवजीकी ऊर्ध्वगतिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 332: शुकदेवजीकी ऊर्ध्वगतिका वर्णन  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  12.332.22-23 
तस्य ब्रह्मर्षिपुत्रस्य विस्मयं ययतु: परम्।
अहो बुद्धिसमाधानं वेदाभ्यासरते द्विजे॥ २२॥
अचिरेणैव कालेन नभश्चरति चन्द्रवत्।
पितृशुश्रूषया बुद्धिं सम्प्राप्तोऽयमनुत्तमाम्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्मर्षि व्यासजी के पुत्र की उत्तम गति देखकर वे दोनों आश्चर्यचकित हो गए । वे आपस में कहने लगे, 'अहा ! इस वेदज्ञ ब्राह्मण की बुद्धि में एकाग्रता कैसी अद्भुत है ? पिता की सेवा से अल्पकाल में ही उत्तम बुद्धि प्राप्त करके यह चन्द्रमा के समान आकाश में विचरण कर रहा है । 22-23॥
 
Both of them were astonished to see the excellent speed of Brahmarishi Vyasji's son. They started saying to each other, 'Oh! How amazing is the concentration in the intellect of this Veda-oriented Brahmin? Having acquired superior intelligence within a short time from his father's service, he is roaming in the sky like the moon. 22-23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)